रविवार, 6 मार्च 2022

गौरव पाण्डेय की कविताएँ

 



गौरव पाण्डेय की यहाँ प्रस्तुत  सात कविताएँ एक सजग और प्रश्नाकुल युवा की कविताएं हैं। संवेदना से गहरे जुड़ाव और अपनी पृष्ठभूमि से गहरे लगाव की इन कविताओं को पढ़ना रिश्तों के बुनियादी सरोकारों की तह तक जाना है। ये कविताएँ मानव मन की सहज उत्सुक कविताएँ हैं जिसे 'दूसरा शनिवार' के पटल पर प्रस्तुत करते हुए संपादकीय टीम को हर्ष का अनुभव हो रहा है। प्रस्तुत है गौरव पाण्डेय की कविताएँ।

१.

विदा न कहना पड़े
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मैं खुश हूँ
कि लोग खुश हैं
उपस्थित हूँ यह सोचते हुए
कि उत्सव में रिक्त न दिखे कोई जगह मेरी वजह से 

कोई आये जब मेरी ओर यह कहते हुए कि
बहुत कठिनाई से बीता पिछला वर्ष
तो हाथ थामते हुए कह सकूँ
हाँ, समझ सकता हूँ

जब बैठा हो कोई पास दुःखों की गिनती करते हुए
तो पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहूँ
यही तो हासिल है बीते वर्ष का
मेरे दोस्त अब छोड़ो भी
रोटी खाओ

जब चलने को हो कोई और कहे कि मिलते रहना चाहिए हमें
तो उतार लूँ उदासी की गठरी उसके कंधों से
और एक पुस्तक हाथ देते हुए
साथ चलते हुए कुछ दूर 
विदा कहूँ

विदा कहूँ
यह सोचते हुए
कि विदा न कहना पड़े कभी किसी से…

२.

माँ को फोन लगाता हूँ
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माँ को फोन लगाता हूँ, पत्नी उठाती है
बताती है बच्चों के हाल-चाल
मेरा पूछती है

माँ पूछ-पूछ कर ऊबा देती थी
तबियत का हाल, सब्जी
चावल-दाल

माँ को फोन लगाता हूँ पत्नी उठाती है
कहती है अपने में उदास रहती है बहन
चुप रहते हैं पिता
प्रतीक्षा में हैं बच्चे कि ‘लौट आएगी अम्मा
डाक्टर के घर से’

माँ को फोन लगाता हूँ पत्नी उठाती है
कहती है काटने को दौड़ता है घर
बेरंग ऋतु और जीवन

हुंकारी भरता है हृदय
कहता है
माँ ही वह ऋतु है
फूटते हैं जहाँ से रंग, खिलते हैं फूल
अन्यथा सब कुछ मिट्टी और उड़ती धूल…

३.

प्रतीक्षा
―――
प्रतीक्षा समय के माथे पर खिला कोई जंगली फूल है
जिसकी महक उम्मीद की तरह बेचैन करती है
एक अदेह चुम्बन जो ऋतुनुकूल गर्म
और सर्द है

एक झरना जो पत्थरों को पानी में बदलता है
एक अंधेरी खाई जिसके गर्भ में एक नदी
उतरती है

कोई बताए क्या कोई प्रतीक्षा कभी बेरंग होती है ?
नहीं, अनगिनत-अदेखे दृश्य आंखों से हृदय तक
सीढियां उतरते-चढ़ते हैं

प्रतीक्षा का हाथ थामें आप दूर तक चल सकते हैं
कंधों पर शीश रख चुप रो सकते हैं
अंक में गुड़ी-मुड़ी सो सकते हैं

एक स्त्री की प्रतीक्षा करते हुए मैंने भी जाना
प्रतीक्षा मन के घोड़ों की लगाम है
एक गौरैया के बच्चे की
पहली उड़ान है

चाहता हूँ कि कोई जब कहीं से लौटकर आये
तो उसकी प्रतीक्षा में एक घर हो
जब कोई जाए तो प्रतीक्षित
एक हृदय हो

कहते हैं ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ प्रतीक्षा न हो
जहाँ कोई किसी की नहीं करता प्रतीक्षा
वहाँ एक कविता हमेशा
प्रतीक्षा करती है ।

४.

प्रेम में डूबी स्त्री सबको क्षमा करती है
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कवि बंद दरवाजे से पूछता है स्त्री का बदला पता
साँकल कहती है मेरे शीश लटक रहे
ताले से पूछो

ताला कहता है तुम्हें उस चाभी से पूछना चाहिए
जिसके कारण यह हृदय सूना है!

कवि चाभी की तलाश में राह खड़े वृक्षों से पूछता है
वृक्ष कहते हैं–प्रतीक्षा हमारी जड़ों में कुल्हाड़ी-सी
लोटती है; उनसे क्यों नहीं पूछते
जिनके पंख हैं!

चिड़िया कहती हैं कहीं दूर-दूर तक नहीं है अन्न
घोसलों में नहीं रहना होता कई-कई दिन
जाओ बादलों से पूछो
जिनका हर जगह आना-जाना है

बादल कहते हैं हम तो नियति से बंधे हैं
नदी से पूछो जिस पर हम
मरते-मिटते हैं

कवि लौटते हुए नदी से पूछता है
और फिर-फिर पूछता है

नदी कहती है–"आसान है स्त्री हृदय में
जगह बनाना; कठिन है
पता बदल जाने पर
तलाश करना

कवि!
जाओ... लौट जाओ
प्रेम में डूबी स्त्री सबको क्षमा करती है।"

५.

एक बेरोजगार आदमी की डायरी के ९ नोट्स
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१.
मुझे नहीं पता कि प्रेम और विवाह की उम्र क्या होती है लेकिन इतना बता सकता हूँ कि बेरोजगारी की कोई उम्र नहीं होती । वह होती है और उसके होने का एहसास हर जगह, हर उम्र, यहाँ तक कि स्वप्न में भी बना रहता है ।

२.
प्रेमिका ने मुझे यह कहते हुए छोड़ा था कि प्रेम और विवाह की एक उम्र होती है। अब उम्र विवाह की है। प्रेम की नहीं ।

३.
पत्नी यह कहते हुए खीझती है कि इस डिग्री से तो एक रोटी भी नहीं पकेगी और ज्ञान का तो अचार भी नहीं बनता ।

४.
शहर में पढ़ा लड़का गाँव-घर में लौटकर असफलता का उदाहरण बनता है लोग कहते हैं ज्यादा पढ़ने-लिखने से मिलता-जुलता कुछ नहीं ऊपर से देह का जांगर भी चला जाता है ।

५.
शिक्षा की सर्वोच्च डिग्री लेने के बावजूद वह समाज में दो कौड़ी का आदमी होता है उन लड़कों के मुकाबले जो दौड़ के पुलिस-मलेट्री में हुए।

६.
बेरोजगार आदमी उन कालेजों-विभागों को दूर से प्रणाम करता है जहाँ से उसने पढ़ाई की और अपने गुरुओं की नजरें बचाकर निकलता हैं जिन्होंने उसे आशीर्वाद दिए ।

७.
जैसे वृक्ष खड़े होते हैं सड़कें छोड़कर ठीक वैसे ही नौकरीशुदा दोस्तों की भीड़ में एक किनारे चुप खड़ा रहता है बेरोजगार आदमी ।

८.
वह दोस्तों के किस्से सुनता है और हाँ में गर्दन झुकाए रहता है और एक अदृश्य खाईं में गिरता चला जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब सहानुभूति के वाक्य शर्मिंदगी का कुंआ खोदते जान पड़ते हैं और मन डूबता चला जाता है ।

९.
बेरोजगार आदमी के सामने खाली पड़ी रहती पूरी पृथ्वी लेकिन उसके लिए कोई जगह नहीं होती है।

६. 

फेकबुक पर महाकवि का  जन्मदिन
―――――――――――――
एक कवि मित्र ने कहा– 'तुम्हें अपनी
वाल पर महाकवि की कविताएँ
लगानी चाहिए'

आलोचना में सक्रिय मित्र ने कहा– 'तुम्हें
लाइव आकर कुछ कविताएँ
पढ़नी चाहिए'

महाकवि की प्रिय कवयित्री ने सलाह दी–
'तुम्हें फोन करके कम से कम उन्हें
नमस्ते कहना चाहिए'

मैंने न फोन किया, न कविताएँ पढ़ीं
न ही पोस्ट लगाई

रात एक संपादक ने फोन कर समझाया–
कविता-वविता लिखना तो ठीक है
लेकिन महाकवियों को साधना भी
आना चाहिए ।

७.

हालचाल इन दिनों
―――――――
इन दिनों
जब कोई पूछता है–'कैसे हो ?'
कहता हूँ जैसा होना चाहिए 'हम-जैसों' को…


परिचय–
गौरव पाण्डेय ( GAURAV PANDEY )
पिता का नाम– विनोद कुमार पाण्डेय
जन्मतिथि– 26/12/1991
पता एवं जन्म स्थान :- ग्राम-दरवेशपुर, पोस्ट-भरवारी, जिला-कौशाम्बी, (उत्तर प्रदेश)

शिक्षा– एम.ए.(हिंदी) ( इलाहाबाद विश्वविद्यालय )
            पी-एच.डी.   (गोरखपुर विश्वविद्यालय )
शोध विषय-  'समकालीन हिंदी कविता की लोकचेतना (विशेष सन्दर्भ: सन 1980 के बाद की कविता )

* सम्प्रति: सहायक आचार्य राजकीय महाविद्यालय चित्रकूट, उत्तर प्रदेश

* प्रकाशन:- नया ज्ञानोदय, वागर्थ, पाखी, कथादेश, दस्तावेज, समावर्तन, समकालीन गाथान्तर, कृति ओर, आदि पत्रिकाओं में कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित।

* साहित्य अकादेमी नयी दिल्ली से पहला कविता संग्रह ‘धरती भी एक चिड़िया है’ नवोदय योजना के अंतर्गत प्रकाशित।

रविवार, 19 जुलाई 2020

अरविन्द पासवान की कविताएँ


अरविन्द जी के नाम में 'पासवान' चाहे जिस कारण से अंकित रहे, वे मन और मिजाज से मानुष हैं। जाहिर है लोक की प्रचलित राजनीतिक शब्दावली में वे दलित हैं। दलित कविता का प्राण तत्व अम्बेडकर और बुद्ध हैं। दलित कविता अपना सौंदर्यबोध वहीं से ग्रहण करती है। मगर अरविन्द पासवान की यहां प्रस्तुत कविताएँ सचबयानी के लिये किसी आलम्बन का सहारा नहीं लेती। और न ही सांस्कृतिक और राजनैतिक वर्चस्व के प्रचलित ढर्रों के सामने समर्पण करती है। वे गीत गाते हैं, गजलों में डूबते-उतराते हैं और मनुष्य होने की तमाम संभावनाओं के दुर्ग-द्वार पर दस्तक देते रहते हैं। जाहिर है मूर्तियों और किताबों की नकली दुनिया के बरक्स वे जीवित मनुष्य और उसकी सत्ता में विश्वास के अद्भुत प्रेम में पगे इंसान हैं। ‘दूसरा शनिवार’ इस कवि की कविताओं को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता के अतिरेक में है। दलित कविता (क्या कविता सच में दलित हो सकती है?) के इस बेहद संवेदनशील और संभावनाशील कवि को अपनी शुभकामनाएं देते हुए टीम ‘दूसरा शनिवार’ गौरवान्वित है।

प्रस्तुति - प्रत्यूष चन्द्र मिश्रा

रचनाकार का आत्मकथ्य :

• परिचय : अरविन्द पासवान 
• जन्म : 18 फरवरी 1973, हाजीपुर, वैशाली
• पत्र-पत्रिकाओं में तथा रेडियो से कविताएँ 
प्रकाशित एवं प्रसारित
• रंगकर्म, गीत, गज़ल एवं संगीत में गहरी रुचि
•"मैं रोज़ लड़ता हूँ' काव्य-संग्रह प्रकाशनाधीन।

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना 
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

पृथ्वी के निर्माण से लेकर और होमो सेपियंस से शुरु होकर अबतक दुनिया में अनेक सभ्यताएं, कई-कई संस्कृतियां गुजर चुकी हैं, बल्कि रोज बन भी रही है; उम्मीद है आगे भी बनती रहेगी। आलोक धन्वा का शब्द उधार लें तो 'दुनिया रोज़ बनती है', और इस तरह वह अपने निशान छोड़कर आगे बढ़ जाने की प्रक्रिया में है। भौतिक कारण प्रकृति के निर्माण में सहज सहायक तो है ही, लेकिन कई कारकों और अवयवों के मेल से समाज की दुनिया बनती है। इसके बनने की अपनी जटिल प्रक्रिया है। कोई किसान बन जाता है, कोई मजदूर, कोई ज्ञानी, विज्ञानी, विचारक, समाज सुधारक, दार्शनिक, नेता, अभिनेता, अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर, कोई चोर, पुलिस, वकील और साहित्यकार आदि। कोई तबका जाति, धर्म, मजहब, फिरकों या काला-गोरा, सवर्ण-अवर्ण, नस्ल, भेद आदि में बँट जाता है तो कोई पण्डित, पादरी, मुल्ला हो जाता है। कभी-कभी स्थति उलट भी जाती है। सब अपनी भूमिका जिम्मेदारी के साथ निभाते हैं। जाहीर सी बात है साहित्यकार भी इसी समाज का अंग है, उसे अपने दायित्वों का निर्वहन करना है, और वे सदियों से करते आ रहे हैं। युग निर्माण में उन्होने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, इसलिए वे समय के प्रवक्ता कहलायें। इस समाज को को सुन्दर बनाने में (जिसमें पशु-पक्षी, सजीव-निर्जीव, सबका बराबर का हक़ है) उनहोंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। आदमी को आदमी बनाने के लिए बड़े-बड़े महाकाव्य, धर्मग्रंथ न जाने क्या-क्या लिखा गया। क्या यह सम्भव हो पाया? यदि पूर्णत: सम्भव नहीं हो पाया तो हमें अपने भीतर झांकने की जरूरत है। उस चूक को आँकने की ज़रूरत है। केवल यह कहकर कि 'हम स्वयं के संतुष्टि के लिए लिखे हैं, लिखते हैं या लिख रहे हैं', तो यह पलायन का प्रतीक होगा। विषमता और अन्धकार जिस तरह से पूरी दुनिया में व्याप्त है, इससे एक समझ बनती है : 'आज भी आदमी इन्सान बनने की प्रक्रिया में है।' फिर भी दुनिया के लोग, पशु-पक्षी और यह सृष्टि बहुत ही सुन्दर है इसे और बेहतर करने की ज़रूरत है। खुद के भीतर के धूल, गर्द झारने की ज़रूरत है। यह तभी सम्भव हो सकेगा, जब हम सच को सच और झूठ को झूठ की तरह देखें और लिखें। फैंटसी या कल्पना में हम सुन्दर रच सकते हैं, लेकिन वहाँ बहक जाने के कई विकल्प हैं, यथार्थ में इसकी गुंजाइश कम है। 

कोई भी साहित्य या कला मेरे लिए खुद की जड़ता को तोड़ने का माध्यम है। यह मेरे लिए रस-रंजन नहीं, रस-बोध है। मुझे वह साहित्य बेहद पसंद है जो समता, मित्रता और बन्धुता की ज़मीन पर खड़ी हो, जिसकी बुनियाद अज्ञान का अन्धकार नहीं, ज्ञान का प्रकाश हो।

जिस रस-बोध से गुजरता हूँ, उसे शब्दाकार देने भर की भरसक कोशिश करता हूँ, अगर एक अक्षर भी आप पर असर करता है तो मेरी कोशिश सार्थक होगी।

1. अम्बेडकर

वह कोई 
ईश्वर या भगवान नहीं था
कि हो जाता मन्दिरों में कैद 
मूर्ति बनकर पत्थर सरीखा

न कोई दूत था वह
गॉड का भेजा हुआ
कि तरह-तरह की लीलाओं में 
होता शामिल

वह कोई खुदा भी नहीं था निर्विकार 

वह एक आदमी था
प्रज्ञा, करुणा और समता का भाव लिए
आदमी के हृदय से बना हुआ
आदमी के ही घृणा की ताप पर पका हुआ
एक आदमी
जो सदियों से सताये हुए
मनुष्यों के दुखों को जान गया था
मान गया था
ईश्वर नहीं
आदमी ही आदमी के
मुक्ति का मार्ग है

2. बच्चे

सिसकते बच्चे से पूछा मैंने-
क्यूँ रो रहे हो बेहिसाब 
सिसकर ही बोला वह-
छोटी-छोटी बातों पर पीटते हैं पापा 
रोने भी नहीं देते घर में जनाब

3. बयान मुश्किल है

इन आँखो में
अब कोई उम्मीद नहीं बची है 
बुढ़ापे की लाठी 
एक डण्डे से छीन ली गई
हमेशा के लिए

उदास आँखों में कोई आस नहीं है 
निरख रहा है दूर बहुत कुछ

और हम लाश बने 
शब्दों की उबासी फेंक रहे हैं 
चारों ओर

उनकी तो उनकी
हमारी नींद में भी खलल पड़ रही है 
अन्धकार और घना हो रहा है 

अपलक आँखों की तेज़ का
बयान मुश्किल है
एक आदमी के लिए

4. हम दफ्न होना शेष हैं

किसी की निश्छल आँखें
उम्मीद भरी निगाहों से हमारी तरफ ताके
और हम नज़रें फेर लें

सदाएँ सुनाई दे
और हम नज़रअंदाज कर 
आगे बढ़ जाएँ

किसी आवाज़ में पुकार हो
और हम बेखबर 
आटा-आलू-तेल में ही लीन रहें

जब गैर ज़रूरी चीजें
हमारी आदतों में शामिल हो जाए
और हमें
हमारी गुलामी का पता भी न चले

रिश्ते पारिवारिक-सामाजिक नहीं
बचा रहे आर्थिक

हमारे वैचारिक रिश्तों को
दीमक अपना घर बना ले

तो बस इतना समझ लीजिए
हम दफ्न होना शेष हैं।

5. शाहजहाँ : दशरथ माँझी

लोग कहते हैं
प्रेम की निशानी है : ताजमहल
जिसे शाहंशाह ने नहीं 
मेहनतकश हाथों ने 
शाहजहाँ के स्नेह मिश्रित शाही खजाने से
बनाया था

अब लोग ही कहते हैं 
प्रेम में केवल 
फर्श, दीवार और गुम्बद ही नहीं 
रास्ते भी बनाये जा सकते हैं
हो सकता है कोई जुनूनी दशरथ माँझी
अपनी काया बिछाकर 
पूरी दुनिया को जोड़ दे
प्रेम की डगर से

(दशरथ माँझी के निधन दिवस पर उन्हे याद करते हुए। जिन्होने पत्नी फगुनिया के प्रेम में पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया। जिसपर आज चलते हैं असंख्य जन। श्रद्धांजलि!)

6. बाकी सब कुछ है

साथियो
आदमी होना बहुत कठिन है 
यह आप भी जानते हैं और हम भी
हम सबकुछ जानते हुए 
यह भी जानते हैं कि 
आदमी जो इस वक्त मुखातिब है आपसे 
ठीक इसी वक्त वह आदमी नहीं है
बाकी सब कुछ है

7. उनकी हँसी : जैसे, फूल खिला हो
(कवि नरेश सक्सेना को समर्पित)

कोई नरेश 
कविता का
इतना हैरान हो सकता है
एक चॉकलेट के लिए
देखा
मैने पहलीबार 

देखा उसकी मुस्कान में 
चंचल हठ
बाल मनुहार

मीठा स्वाद चखा भाषा की
अभी-अभी
एक शिशु के उच्चारण से।


फूटती है कविता
भाषा-रस की मिट्टी में
संवेदना की जड़ से
भीनी खुशबू के साथ
प्रकट होती है 
धरती के सीने पर 

एक चॉकलेट 
टूटता है जीभ तले
बिखर जाता है स्वाद 
भीतर ही भीतर
पसर जाता है शिशु के संसार में।

8. अब और नहीं

याद रखो नपुंसकों
चाहे तुम राजगीर की पहाड़ियों पर
शिश्न रगड़ 
अपने वहशीपन को खाक करो
राजधानी राँची में नंगई का रंग उड़ेलो
या
हैदराबाद में हद से गुजरो

एक अनु की आसुओं के सैलाब में
अब तुम्हरा नकली पुरुषत्व
दफन होने ही वाला है

9. वेद जी के साथ गज़ल सुनते हुए

अभी
बिलकुल अभी की बात है
हालाँकि वैसी कोई बात नहीं है
बात कुछ खास भी नहीं है
कविता या कहानी जैसी भी नहीं है
एक गज़ल सुनने और सुनाने की बात है

वेद जी 
अपार्टमेंट के गार्ड हैं
उमर सत्तर पार
देह से लाचार
मौत को धता बता चुके हैं कई-कई बार
हालाँकि इनके कान
इन्हे धोखा भी देते रहते हैं बारम्बार

जबतक मैं डेरा लौट न जाऊँ 
वेद जी अपने-आप में नहीं लौटते

आज गुलाम अली को सुनते हुए डेरा पहुँचा

(कितनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचो में गुम रहते हो)

रोज की तरह कार पार्क करवाने के बाद 
वेद जी कार के ही बगल में कुछ देर खड़े रहे
ध्यान से अकानते रहे एक-एक शब्द

वेद जी
यह सुनने में कैसा लगा

ठीक

धुन अच्छा है
अब ऐसा कहाँ सुनने को मिलता है

पहले कभी सुना आपने?

नहीं।

यह कुछ कव्वाली की तरह लगता है

लेकिन धुन अच्छा है!

10. गाँधी मैदान में गिरा रावण 

आज नवमी के दिन ही 
जलने के पहले
ज़मीन पर गिर गया रावण

वह जल-जलकर
जड़वत
लम्बवत है सदियों से 
आकाश की तरफ बढ़ते हुए
जितनी लम्बाई से वह जला
उससे 100 गुणा या इससे भी अधिक आकार से 
छाता गया क्षितिज पर

क्या सोचकर गिरा होगा वह
अचानक ही गिर गया होगा
या जल-जलकर उगता गया होगा

सोचा होगा 

इस लीला में मेरी ज़रूरत नहीं है 
अब तो असंख्य लीलाधर मौजूद हैं धरती पर
जलने से बेहतर है 
मिट्टी में फना हो जाओ

उनके सपने साकार होने दो
जिनके सपनों में मैं राख बनकर
सालों भर उड़ता रहता हूँ 

उधर
रावण जलओ कमेटी के अध्यक्ष की
नाक और मूँछ पर आ पड़ी है
इसलिए 
संघ के सदस्यों ने फैसला लिया है
रावण को फिर से खड़ा किया जाएगा
घी के दीये के साथ 
उसे धूम-धाम से जलाया जाएगा।

11. यह सच है

हम हिन्दू हैं 
वे मुसलमान
इसी तरह सिक्ख ईसाई
बौद्ध जैन पारसी
और न जाने किन-किन धर्मों के साथ
जी रहे हैं धरती पर
दुनिया के लोग
काले और गोरे रंग वाले भी 
जी रहे हैं साथ-साथ इसी दुनिया में 
पर
यह भी सच है
सच के साथ हम कम ही जी रहे हैं
रंग, नस्ल, जाति और धर्म ने हमें
सदियों से गुलाम बना रखा है