गौरव पाण्डेय की यहाँ प्रस्तुत सात कविताएँ एक सजग और प्रश्नाकुल युवा की कविताएं हैं। संवेदना से गहरे जुड़ाव और अपनी पृष्ठभूमि से गहरे लगाव की इन कविताओं को पढ़ना रिश्तों के बुनियादी सरोकारों की तह तक जाना है। ये कविताएँ मानव मन की सहज उत्सुक कविताएँ हैं जिसे 'दूसरा शनिवार' के पटल पर प्रस्तुत करते हुए संपादकीय टीम को हर्ष का अनुभव हो रहा है। प्रस्तुत है गौरव पाण्डेय की कविताएँ।
१.
विदा न कहना पड़े
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मैं खुश हूँ
कि लोग खुश हैं
उपस्थित हूँ यह सोचते हुए
कि उत्सव में रिक्त न दिखे कोई जगह मेरी वजह से
कोई आये जब मेरी ओर यह कहते हुए कि
बहुत कठिनाई से बीता पिछला वर्ष
तो हाथ थामते हुए कह सकूँ
हाँ, समझ सकता हूँ
जब बैठा हो कोई पास दुःखों की गिनती करते हुए
तो पीठ पर एक धौल जमाते हुए कहूँ
यही तो हासिल है बीते वर्ष का
मेरे दोस्त अब छोड़ो भी
रोटी खाओ
जब चलने को हो कोई और कहे कि मिलते रहना चाहिए हमें
तो उतार लूँ उदासी की गठरी उसके कंधों से
और एक पुस्तक हाथ देते हुए
साथ चलते हुए कुछ दूर
विदा कहूँ
विदा कहूँ
यह सोचते हुए
कि विदा न कहना पड़े कभी किसी से…
२.
माँ को फोन लगाता हूँ
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माँ को फोन लगाता हूँ, पत्नी उठाती है
बताती है बच्चों के हाल-चाल
मेरा पूछती है
माँ पूछ-पूछ कर ऊबा देती थी
तबियत का हाल, सब्जी
चावल-दाल
माँ को फोन लगाता हूँ पत्नी उठाती है
कहती है अपने में उदास रहती है बहन
चुप रहते हैं पिता
प्रतीक्षा में हैं बच्चे कि ‘लौट आएगी अम्मा
डाक्टर के घर से’
माँ को फोन लगाता हूँ पत्नी उठाती है
कहती है काटने को दौड़ता है घर
बेरंग ऋतु और जीवन
हुंकारी भरता है हृदय
कहता है
माँ ही वह ऋतु है
फूटते हैं जहाँ से रंग, खिलते हैं फूल
अन्यथा सब कुछ मिट्टी और उड़ती धूल…
३.
प्रतीक्षा
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प्रतीक्षा समय के माथे पर खिला कोई जंगली फूल है
जिसकी महक उम्मीद की तरह बेचैन करती है
एक अदेह चुम्बन जो ऋतुनुकूल गर्म
और सर्द है
एक झरना जो पत्थरों को पानी में बदलता है
एक अंधेरी खाई जिसके गर्भ में एक नदी
उतरती है
कोई बताए क्या कोई प्रतीक्षा कभी बेरंग होती है ?
नहीं, अनगिनत-अदेखे दृश्य आंखों से हृदय तक
सीढियां उतरते-चढ़ते हैं
प्रतीक्षा का हाथ थामें आप दूर तक चल सकते हैं
कंधों पर शीश रख चुप रो सकते हैं
अंक में गुड़ी-मुड़ी सो सकते हैं
एक स्त्री की प्रतीक्षा करते हुए मैंने भी जाना
प्रतीक्षा मन के घोड़ों की लगाम है
एक गौरैया के बच्चे की
पहली उड़ान है
चाहता हूँ कि कोई जब कहीं से लौटकर आये
तो उसकी प्रतीक्षा में एक घर हो
जब कोई जाए तो प्रतीक्षित
एक हृदय हो
कहते हैं ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ प्रतीक्षा न हो
जहाँ कोई किसी की नहीं करता प्रतीक्षा
वहाँ एक कविता हमेशा
प्रतीक्षा करती है ।
४.
प्रेम में डूबी स्त्री सबको क्षमा करती है
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कवि बंद दरवाजे से पूछता है स्त्री का बदला पता
साँकल कहती है मेरे शीश लटक रहे
ताले से पूछो
ताला कहता है तुम्हें उस चाभी से पूछना चाहिए
जिसके कारण यह हृदय सूना है!
कवि चाभी की तलाश में राह खड़े वृक्षों से पूछता है
वृक्ष कहते हैं–प्रतीक्षा हमारी जड़ों में कुल्हाड़ी-सी
लोटती है; उनसे क्यों नहीं पूछते
जिनके पंख हैं!
चिड़िया कहती हैं कहीं दूर-दूर तक नहीं है अन्न
घोसलों में नहीं रहना होता कई-कई दिन
जाओ बादलों से पूछो
जिनका हर जगह आना-जाना है
बादल कहते हैं हम तो नियति से बंधे हैं
नदी से पूछो जिस पर हम
मरते-मिटते हैं
कवि लौटते हुए नदी से पूछता है
और फिर-फिर पूछता है
नदी कहती है–"आसान है स्त्री हृदय में
जगह बनाना; कठिन है
पता बदल जाने पर
तलाश करना
कवि!
जाओ... लौट जाओ
प्रेम में डूबी स्त्री सबको क्षमा करती है।"
५.
एक बेरोजगार आदमी की डायरी के ९ नोट्स
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१.
मुझे नहीं पता कि प्रेम और विवाह की उम्र क्या होती है लेकिन इतना बता सकता हूँ कि बेरोजगारी की कोई उम्र नहीं होती । वह होती है और उसके होने का एहसास हर जगह, हर उम्र, यहाँ तक कि स्वप्न में भी बना रहता है ।
२.
प्रेमिका ने मुझे यह कहते हुए छोड़ा था कि प्रेम और विवाह की एक उम्र होती है। अब उम्र विवाह की है। प्रेम की नहीं ।
३.
पत्नी यह कहते हुए खीझती है कि इस डिग्री से तो एक रोटी भी नहीं पकेगी और ज्ञान का तो अचार भी नहीं बनता ।
४.
शहर में पढ़ा लड़का गाँव-घर में लौटकर असफलता का उदाहरण बनता है लोग कहते हैं ज्यादा पढ़ने-लिखने से मिलता-जुलता कुछ नहीं ऊपर से देह का जांगर भी चला जाता है ।
५.
शिक्षा की सर्वोच्च डिग्री लेने के बावजूद वह समाज में दो कौड़ी का आदमी होता है उन लड़कों के मुकाबले जो दौड़ के पुलिस-मलेट्री में हुए।
६.
बेरोजगार आदमी उन कालेजों-विभागों को दूर से प्रणाम करता है जहाँ से उसने पढ़ाई की और अपने गुरुओं की नजरें बचाकर निकलता हैं जिन्होंने उसे आशीर्वाद दिए ।
७.
जैसे वृक्ष खड़े होते हैं सड़कें छोड़कर ठीक वैसे ही नौकरीशुदा दोस्तों की भीड़ में एक किनारे चुप खड़ा रहता है बेरोजगार आदमी ।
८.
वह दोस्तों के किस्से सुनता है और हाँ में गर्दन झुकाए रहता है और एक अदृश्य खाईं में गिरता चला जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब सहानुभूति के वाक्य शर्मिंदगी का कुंआ खोदते जान पड़ते हैं और मन डूबता चला जाता है ।
९.
बेरोजगार आदमी के सामने खाली पड़ी रहती पूरी पृथ्वी लेकिन उसके लिए कोई जगह नहीं होती है।
६.
फेकबुक पर महाकवि का जन्मदिन
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एक कवि मित्र ने कहा– 'तुम्हें अपनी
वाल पर महाकवि की कविताएँ
लगानी चाहिए'
आलोचना में सक्रिय मित्र ने कहा– 'तुम्हें
लाइव आकर कुछ कविताएँ
पढ़नी चाहिए'
महाकवि की प्रिय कवयित्री ने सलाह दी–
'तुम्हें फोन करके कम से कम उन्हें
नमस्ते कहना चाहिए'
मैंने न फोन किया, न कविताएँ पढ़ीं
न ही पोस्ट लगाई
रात एक संपादक ने फोन कर समझाया–
कविता-वविता लिखना तो ठीक है
लेकिन महाकवियों को साधना भी
आना चाहिए ।
७.
हालचाल इन दिनों
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इन दिनों
जब कोई पूछता है–'कैसे हो ?'
कहता हूँ जैसा होना चाहिए 'हम-जैसों' को…
परिचय–
गौरव पाण्डेय ( GAURAV PANDEY )
पिता का नाम– विनोद कुमार पाण्डेय
जन्मतिथि– 26/12/1991
पता एवं जन्म स्थान :- ग्राम-दरवेशपुर, पोस्ट-भरवारी, जिला-कौशाम्बी, (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा– एम.ए.(हिंदी) ( इलाहाबाद विश्वविद्यालय )
पी-एच.डी. (गोरखपुर विश्वविद्यालय )
शोध विषय- 'समकालीन हिंदी कविता की लोकचेतना (विशेष सन्दर्भ: सन 1980 के बाद की कविता )
* सम्प्रति: सहायक आचार्य राजकीय महाविद्यालय चित्रकूट, उत्तर प्रदेश
* प्रकाशन:- नया ज्ञानोदय, वागर्थ, पाखी, कथादेश, दस्तावेज, समावर्तन, समकालीन गाथान्तर, कृति ओर, आदि पत्रिकाओं में कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित।
* साहित्य अकादेमी नयी दिल्ली से पहला कविता संग्रह ‘धरती भी एक चिड़िया है’ नवोदय योजना के अंतर्गत प्रकाशित।
