अरविन्द जी के नाम में 'पासवान' चाहे जिस कारण से अंकित रहे, वे मन और मिजाज से मानुष हैं। जाहिर है लोक की प्रचलित राजनीतिक शब्दावली में वे दलित हैं। दलित कविता का प्राण तत्व अम्बेडकर और बुद्ध हैं। दलित कविता अपना सौंदर्यबोध वहीं से ग्रहण करती है। मगर अरविन्द पासवान की यहां प्रस्तुत कविताएँ सचबयानी के लिये किसी आलम्बन का सहारा नहीं लेती। और न ही सांस्कृतिक और राजनैतिक वर्चस्व के प्रचलित ढर्रों के सामने समर्पण करती है। वे गीत गाते हैं, गजलों में डूबते-उतराते हैं और मनुष्य होने की तमाम संभावनाओं के दुर्ग-द्वार पर दस्तक देते रहते हैं। जाहिर है मूर्तियों और किताबों की नकली दुनिया के बरक्स वे जीवित मनुष्य और उसकी सत्ता में विश्वास के अद्भुत प्रेम में पगे इंसान हैं। ‘दूसरा शनिवार’ इस कवि की कविताओं को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता के अतिरेक में है। दलित कविता (क्या कविता सच में दलित हो सकती है?) के इस बेहद संवेदनशील और संभावनाशील कवि को अपनी शुभकामनाएं देते हुए टीम ‘दूसरा शनिवार’ गौरवान्वित है।
प्रस्तुति - प्रत्यूष चन्द्र मिश्रा
रचनाकार का आत्मकथ्य :
• परिचय : अरविन्द पासवान
• जन्म : 18 फरवरी 1973, हाजीपुर, वैशाली
• पत्र-पत्रिकाओं में तथा रेडियो से कविताएँ
प्रकाशित एवं प्रसारित
• रंगकर्म, गीत, गज़ल एवं संगीत में गहरी रुचि
•"मैं रोज़ लड़ता हूँ' काव्य-संग्रह प्रकाशनाधीन।
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
पृथ्वी के निर्माण से लेकर और होमो सेपियंस से शुरु होकर अबतक दुनिया में अनेक सभ्यताएं, कई-कई संस्कृतियां गुजर चुकी हैं, बल्कि रोज बन भी रही है; उम्मीद है आगे भी बनती रहेगी। आलोक धन्वा का शब्द उधार लें तो 'दुनिया रोज़ बनती है', और इस तरह वह अपने निशान छोड़कर आगे बढ़ जाने की प्रक्रिया में है। भौतिक कारण प्रकृति के निर्माण में सहज सहायक तो है ही, लेकिन कई कारकों और अवयवों के मेल से समाज की दुनिया बनती है। इसके बनने की अपनी जटिल प्रक्रिया है। कोई किसान बन जाता है, कोई मजदूर, कोई ज्ञानी, विज्ञानी, विचारक, समाज सुधारक, दार्शनिक, नेता, अभिनेता, अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर, कोई चोर, पुलिस, वकील और साहित्यकार आदि। कोई तबका जाति, धर्म, मजहब, फिरकों या काला-गोरा, सवर्ण-अवर्ण, नस्ल, भेद आदि में बँट जाता है तो कोई पण्डित, पादरी, मुल्ला हो जाता है। कभी-कभी स्थति उलट भी जाती है। सब अपनी भूमिका जिम्मेदारी के साथ निभाते हैं। जाहीर सी बात है साहित्यकार भी इसी समाज का अंग है, उसे अपने दायित्वों का निर्वहन करना है, और वे सदियों से करते आ रहे हैं। युग निर्माण में उन्होने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, इसलिए वे समय के प्रवक्ता कहलायें। इस समाज को को सुन्दर बनाने में (जिसमें पशु-पक्षी, सजीव-निर्जीव, सबका बराबर का हक़ है) उनहोंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। आदमी को आदमी बनाने के लिए बड़े-बड़े महाकाव्य, धर्मग्रंथ न जाने क्या-क्या लिखा गया। क्या यह सम्भव हो पाया? यदि पूर्णत: सम्भव नहीं हो पाया तो हमें अपने भीतर झांकने की जरूरत है। उस चूक को आँकने की ज़रूरत है। केवल यह कहकर कि 'हम स्वयं के संतुष्टि के लिए लिखे हैं, लिखते हैं या लिख रहे हैं', तो यह पलायन का प्रतीक होगा। विषमता और अन्धकार जिस तरह से पूरी दुनिया में व्याप्त है, इससे एक समझ बनती है : 'आज भी आदमी इन्सान बनने की प्रक्रिया में है।' फिर भी दुनिया के लोग, पशु-पक्षी और यह सृष्टि बहुत ही सुन्दर है इसे और बेहतर करने की ज़रूरत है। खुद के भीतर के धूल, गर्द झारने की ज़रूरत है। यह तभी सम्भव हो सकेगा, जब हम सच को सच और झूठ को झूठ की तरह देखें और लिखें। फैंटसी या कल्पना में हम सुन्दर रच सकते हैं, लेकिन वहाँ बहक जाने के कई विकल्प हैं, यथार्थ में इसकी गुंजाइश कम है।
कोई भी साहित्य या कला मेरे लिए खुद की जड़ता को तोड़ने का माध्यम है। यह मेरे लिए रस-रंजन नहीं, रस-बोध है। मुझे वह साहित्य बेहद पसंद है जो समता, मित्रता और बन्धुता की ज़मीन पर खड़ी हो, जिसकी बुनियाद अज्ञान का अन्धकार नहीं, ज्ञान का प्रकाश हो।
जिस रस-बोध से गुजरता हूँ, उसे शब्दाकार देने भर की भरसक कोशिश करता हूँ, अगर एक अक्षर भी आप पर असर करता है तो मेरी कोशिश सार्थक होगी।
1. अम्बेडकर
वह कोई
ईश्वर या भगवान नहीं था
कि हो जाता मन्दिरों में कैद
मूर्ति बनकर पत्थर सरीखा
न कोई दूत था वह
गॉड का भेजा हुआ
कि तरह-तरह की लीलाओं में
होता शामिल
वह कोई खुदा भी नहीं था निर्विकार
वह एक आदमी था
प्रज्ञा, करुणा और समता का भाव लिए
आदमी के हृदय से बना हुआ
आदमी के ही घृणा की ताप पर पका हुआ
एक आदमी
जो सदियों से सताये हुए
मनुष्यों के दुखों को जान गया था
मान गया था
ईश्वर नहीं
आदमी ही आदमी के
मुक्ति का मार्ग है
2. बच्चे
सिसकते बच्चे से पूछा मैंने-
क्यूँ रो रहे हो बेहिसाब
सिसकर ही बोला वह-
छोटी-छोटी बातों पर पीटते हैं पापा
रोने भी नहीं देते घर में जनाब
3. बयान मुश्किल है
इन आँखो में
अब कोई उम्मीद नहीं बची है
बुढ़ापे की लाठी
एक डण्डे से छीन ली गई
हमेशा के लिए
उदास आँखों में कोई आस नहीं है
निरख रहा है दूर बहुत कुछ
और हम लाश बने
शब्दों की उबासी फेंक रहे हैं
चारों ओर
उनकी तो उनकी
हमारी नींद में भी खलल पड़ रही है
अन्धकार और घना हो रहा है
अपलक आँखों की तेज़ का
बयान मुश्किल है
एक आदमी के लिए
4. हम दफ्न होना शेष हैं
किसी की निश्छल आँखें
उम्मीद भरी निगाहों से हमारी तरफ ताके
और हम नज़रें फेर लें
सदाएँ सुनाई दे
और हम नज़रअंदाज कर
आगे बढ़ जाएँ
किसी आवाज़ में पुकार हो
और हम बेखबर
आटा-आलू-तेल में ही लीन रहें
जब गैर ज़रूरी चीजें
हमारी आदतों में शामिल हो जाए
और हमें
हमारी गुलामी का पता भी न चले
रिश्ते पारिवारिक-सामाजिक नहीं
बचा रहे आर्थिक
हमारे वैचारिक रिश्तों को
दीमक अपना घर बना ले
तो बस इतना समझ लीजिए
हम दफ्न होना शेष हैं।
5. शाहजहाँ : दशरथ माँझी
लोग कहते हैं
प्रेम की निशानी है : ताजमहल
जिसे शाहंशाह ने नहीं
मेहनतकश हाथों ने
शाहजहाँ के स्नेह मिश्रित शाही खजाने से
बनाया था
अब लोग ही कहते हैं
प्रेम में केवल
फर्श, दीवार और गुम्बद ही नहीं
रास्ते भी बनाये जा सकते हैं
हो सकता है कोई जुनूनी दशरथ माँझी
अपनी काया बिछाकर
पूरी दुनिया को जोड़ दे
प्रेम की डगर से
(दशरथ माँझी के निधन दिवस पर उन्हे याद करते हुए। जिन्होने पत्नी फगुनिया के प्रेम में पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया। जिसपर आज चलते हैं असंख्य जन। श्रद्धांजलि!)
6. बाकी सब कुछ है
साथियो
आदमी होना बहुत कठिन है
यह आप भी जानते हैं और हम भी
हम सबकुछ जानते हुए
यह भी जानते हैं कि
आदमी जो इस वक्त मुखातिब है आपसे
ठीक इसी वक्त वह आदमी नहीं है
बाकी सब कुछ है
7. उनकी हँसी : जैसे, फूल खिला हो
(कवि नरेश सक्सेना को समर्पित)
१
कोई नरेश
कविता का
इतना हैरान हो सकता है
एक चॉकलेट के लिए
देखा
मैने पहलीबार
देखा उसकी मुस्कान में
चंचल हठ
बाल मनुहार
मीठा स्वाद चखा भाषा की
अभी-अभी
एक शिशु के उच्चारण से।
२
फूटती है कविता
भाषा-रस की मिट्टी में
संवेदना की जड़ से
भीनी खुशबू के साथ
प्रकट होती है
धरती के सीने पर
एक चॉकलेट
टूटता है जीभ तले
बिखर जाता है स्वाद
भीतर ही भीतर
पसर जाता है शिशु के संसार में।
8. अब और नहीं
याद रखो नपुंसकों
चाहे तुम राजगीर की पहाड़ियों पर
शिश्न रगड़
अपने वहशीपन को खाक करो
राजधानी राँची में नंगई का रंग उड़ेलो
या
हैदराबाद में हद से गुजरो
एक अनु की आसुओं के सैलाब में
अब तुम्हरा नकली पुरुषत्व
दफन होने ही वाला है
9. वेद जी के साथ गज़ल सुनते हुए
अभी
बिलकुल अभी की बात है
हालाँकि वैसी कोई बात नहीं है
बात कुछ खास भी नहीं है
कविता या कहानी जैसी भी नहीं है
एक गज़ल सुनने और सुनाने की बात है
वेद जी
अपार्टमेंट के गार्ड हैं
उमर सत्तर पार
देह से लाचार
मौत को धता बता चुके हैं कई-कई बार
हालाँकि इनके कान
इन्हे धोखा भी देते रहते हैं बारम्बार
जबतक मैं डेरा लौट न जाऊँ
वेद जी अपने-आप में नहीं लौटते
आज गुलाम अली को सुनते हुए डेरा पहुँचा
(कितनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचो में गुम रहते हो)
रोज की तरह कार पार्क करवाने के बाद
वेद जी कार के ही बगल में कुछ देर खड़े रहे
ध्यान से अकानते रहे एक-एक शब्द
वेद जी
यह सुनने में कैसा लगा
ठीक
धुन अच्छा है
अब ऐसा कहाँ सुनने को मिलता है
पहले कभी सुना आपने?
नहीं।
यह कुछ कव्वाली की तरह लगता है
लेकिन धुन अच्छा है!
10. गाँधी मैदान में गिरा रावण
आज नवमी के दिन ही
जलने के पहले
ज़मीन पर गिर गया रावण
वह जल-जलकर
जड़वत
लम्बवत है सदियों से
आकाश की तरफ बढ़ते हुए
जितनी लम्बाई से वह जला
उससे 100 गुणा या इससे भी अधिक आकार से
छाता गया क्षितिज पर
क्या सोचकर गिरा होगा वह
अचानक ही गिर गया होगा
या जल-जलकर उगता गया होगा
सोचा होगा
इस लीला में मेरी ज़रूरत नहीं है
अब तो असंख्य लीलाधर मौजूद हैं धरती पर
जलने से बेहतर है
मिट्टी में फना हो जाओ
उनके सपने साकार होने दो
जिनके सपनों में मैं राख बनकर
सालों भर उड़ता रहता हूँ
उधर
रावण जलओ कमेटी के अध्यक्ष की
नाक और मूँछ पर आ पड़ी है
इसलिए
संघ के सदस्यों ने फैसला लिया है
रावण को फिर से खड़ा किया जाएगा
घी के दीये के साथ
उसे धूम-धाम से जलाया जाएगा।
11. यह सच है
हम हिन्दू हैं
वे मुसलमान
इसी तरह सिक्ख ईसाई
बौद्ध जैन पारसी
और न जाने किन-किन धर्मों के साथ
जी रहे हैं धरती पर
दुनिया के लोग
काले और गोरे रंग वाले भी
जी रहे हैं साथ-साथ इसी दुनिया में
पर
यह भी सच है
सच के साथ हम कम ही जी रहे हैं
रंग, नस्ल, जाति और धर्म ने हमें
सदियों से गुलाम बना रखा है

विचार से पगी हुई परिपक्व कविताएँ हैं अरविंद जी की ! दूसरा शनिवार अच्छी कविताओं के एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में सामने आ रहा। स्वागत है।
जवाब देंहटाएंअरविंद की कविताओं में कुल मिला कर जीवन का उत्स है . वह छोटी -छोटी बातों पर गौर करते हैं ,जैसे एक छोटा बच्चा रोने के लिए एक आज़ाद जगह तलाश रहा होता है ,या ऐसा ही कुछ और . वैचारिक रूप से अपने आंबेडकर को वह ईश्वरत्व से मुक्त कर एक मनुष्य बनाते हैं ,क्योंकि वह मानते हैं ,मनुष्य की मुक्ति कोई ईश्वर नहीं कर सकता . अरविंद की कविताओं को दलित - कविता के कोष्ठक में डालना मुश्किल होगा . वे जीवन की समग्रता की कविताएं हैं और कविता के मुख्य - धारा की कविताओं में भी ख़ास हैं . कुल ग्यारह कविताओं की यह बानगी समकालीन कविता में कवि अरविंद की दस्तक के प्रति हमें आश्वस्त करती हैं .
जवाब देंहटाएंअच्छा लगा यह जानकर कि पासवान शब्द अरविंद जी से जुड़कर उन्हें मानुष होने की कमी कोताही से अलग नहीं कर पाया और यह गुरु गंभीर शब्द भी उनके दलित होने की ताकीद में फिट नहीं ही बैठा। बधाई कि इस ब्लॉग पर अरविंद भाई की कविताएं साया हुइंन। खैर, इन कविताओं का पाठक और प्रशंसक तो पहले से ही हूँ। पुनः बधाई देता हूँ। यह आग और त्वरा बनी रहे।
जवाब देंहटाएंकर्मानंद आर्य
अच्छा लगा यह जानकर कि पासवान शब्द अरविंद जी से जुड़कर उन्हें मानुष होने की कमी कोताही से अलग नहीं कर पाया और यह गुरु गंभीर शब्द भी उनके दलित होने की ताकीद में फिट नहीं ही बैठा। बधाई कि इस ब्लॉग पर अरविंद भाई की कविताएं साया हुइंन। खैर, इन कविताओं का पाठक और प्रशंसक तो पहले से ही हूँ। पुनः बधाई देता हूँ। यह आग और त्वरा बनी रहे।
जवाब देंहटाएंकर्मानंद आर्य